श्राद्ध क्यों किया जाता है ?किया फल मिलता है ?

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श्राद्ध क्यों किया जाता है ?किया फल मिलता है ?

पितृ पक्ष या श्राद्ध-भाद्रपद माह की पूर्णिमा से यह प्रारम्भ होता है तथा आश्विन माह की अमावस तक यह श्राद्ध किया जाता है। इन 16 दिनोके दौरान पितरो की आत्मा की शांति के लिए जो भी श्रद्धा पूर्वक दान किया जाता है उसे श्राद्ध कहते है।  ब्राह्मण व् ब्राह्मणी को भोजन कराया जाता है साथ ही दान में दक्षणा भी दिया जाता है यदि किसी पुरुष का श्राद्ध हो तो ब्राह्मण को भोजन खिलाकर धोती व् गमछा देकर साथ ही दक्षणा देकर विदा किया जाता है यदि स्त्री का श्राद्ध हो तो ब्राह्मणी को भोजन खिलाकर साड़ी व् दक्षिणा देकर विदा किया जाता है

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पितृ पक्ष प्रचलित कथा -पितृ पक्ष की महिमा को लेकर कई कथा भी प्रचलित है । जिनका पाठ तर्पण करते हुए कही जाती है इसमें महाभारत काल के कर्ण की कथा अधिक प्रचलित है महाभारत युद्ध के दौरान कर्ण की वीरगति को प्राप्त (मृत्यु) होने के पश्चात जब कर्ण की आत्मा स्वर्ग में पहुंची तब उनको भोजन में सोना, चाँदी, हीरे, मोती, जवाहरात, परोसे गए तब कर्ण ने इन्द्र देव से इसका कारन पूछा तब इन्द्र देव ने बताया की तुमने अपने जीवन काल में  सोना, चाँदी, हीरे, मोती, जवाहरात, आदि दान किये है भोजन का कभी भी दान नहीं किया । 

 

           इस युध में तुम्हारे पुत्र भी मारे जा चुके है। इसलिए तुम्हारे नाम पर किसी ने भी भोजन और तर्पण नहीं किया है। तब  कर्ण ने इन्द्न को बताया की उन्हें अपने पुर्नजो के बारे में कोई जानकारी नहीं थी । इसी कारण वे कुछ भी दान ही नहीं कर पाए। यह जानकर इन्द्र देव ने 16  दिन के लिए कर्ण को पृथ्वी पर वापस भेजा। पृथ्वी पर वापस आकर कर्ण ने आपने पूर्वजो को याद करके विधि वधान के साथतर्पण किया तथा

ब्राह्मणो को भी भोजन कराया और दक्षणा  देकर विदा किया।  इन्ही १६ दिनों की अवधि को श्राद्ध या पितृ पक्ष कहा जाता है

            

        श्राद्ध या पितृ पक्ष को शांति और संतोष करना एक गंभीर  विषय है जिसके बारे में  पूरा समझना अत्यंत आवश्यक  है। फिर भी कुछ मुख्य उदाहरण  मानव के हित के लिए, जिसके बारे में जानकारी न होने  की वजह से कार्य की पूर्णता तथा उसका लाभ नहीं मिल  पाता है, कुछ उदाहरण निम्नलिखित इसप्रकार है - 

        (1) श्राद्ध पक्ष को 16 श्राद्ध कहा जाता है, जो भाद्रपद माह की पूर्णिमा से प्रारंभ होता है तथा पूरे 16 दिन आश्विन की अमावस तक माना जाता है। इन 16 दिन श्राद्ध-तर्पण इत्यादि कार्य किए जाते हैं।

        (2) पूर्णिमा को ऋषियों के निमित्त श्राद्ध, नवमी को सौभाग्यवती स्त्री के लिए, द्वादशी को यतियों, संन्यासियों के निमित्त, चतुर्दशी को शस्‍त्राघात से मृतकों के लिए श्राद्ध, अमावस को जिनकी तिथि नहीं मालूम हो, उनके लिए श्राद्ध किया जाता है।

        (3) जिनकी मृत्यु हो गयी हो, उनकी मृत्यु के तीसरे या पांचवें वर्ष उन्हें पितृ में मिलाया जाता है। जिस तिथि को मृत्यु हुई, उसी तिथि को यह कार्य किया जाता है, भले ही मृत्यु किसी भी पक्ष में हुई हो।

        (4) एकाधिक पुत्र होने पर यदि सम्मिलित रहते हों तो एक जगह और यदि अलग-अलग रहते हों तो सभी को अलग-अलग श्राद्ध करना चाहिए, न कि बड़े पुत्र या छोटे को, यह भ्रांति नहीं पालना चाहिए।

        (5) पुत्र नहीं होने पर सगोत्री(सगे सम्बन्धी ), यह भी नहीं होने पर बेटी का बेटा श्राद्ध करने का अधिकारी माना जाता है। वैसे कोई भी किसी के निमित्त श्राद्ध कर सकता है।

        (6) ऐसा भी कहा जाता है कि यदि  गयाजी में पिंडदान कर लिया है तो श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। मृत्यु के उपरांत जीव प्रेत योनि में जाता है, उसी प्रेत को पितृलोक में भेजने के कर्मकांड हम किसी तीर्थ या गयाजी में करते हैं। मोक्ष देने का अधिकार परमपिता परमेश्वर को ही है। 3 साल श्राद्ध नहीं करने पर‍ पितृ दोबारा प्रेत बन जाते हैं। यह समझने की बात है। गयाजी में जाकर‍ पिंडदान के उपरांत श्री बद्रीनाथ धाम में स्‍थित 'ब्रह्म कपाली' में पिंडदान किया जाता है, जो कम लोग जानते हैं। ब्रह्म कपाली में किया जाने वाला पिंडदान आखिरी माना जाता है।

       (7) पितृ पक्ष में पितृ लोक के द्वार खुलते हैं तथा सभी पितृदेव अपने-अपने पुत्रादि के घर पर जाकर स्‍थित हो जाते हैं तथा अपने निमित्त किए गए तर्पण, भोजनादि का इंतजार करते हैं। नहीं किए जाने पर रुष्ट होकर शाप देकर वापस चले जाते हैं। उनके शाप देने के कारण ही मानव जीवन में ‍कठिनाइयों का दौर शुरू होता है। 'श्राद्ध' शब्द 'श्रद्धा' से बना है अत: इस कार्य में श्रद्धा की ‍नितांत आवश्यकता है।

       (8) भोजन इत्यादि में उपयोग किए जाने वाले बर्तन पीतल के होने चाहिए, स्टील के बर्तन मान्य नहीं हैं।

      (9) सबसे आवश्यक वस्तु है संकल्प। संकल्प के बगैर किया गया कार्य पूर्ण नहीं माना जाता है। यदि संस्कृत में नहीं बोल सकें, तो अपनी भाषा में ही क्रिया का उल्लेख कर जल छोड़ दें। भोजनादि के उपरांत दक्षिणा अवश्य दें। जहां भोजन की व्यवस्था नहीं हो, वहां सीधा दान (कच्चा अन्न आदि) जिसे आमान्न दान कहते हैं, दिया जाता है। वह एक परिवार के लिए एक दिन का हो, यह ध्यान रखें.

         जब पितृ प्रसन्न हो जाते है तब वह आशीर्वाद देते है। उनकी ही कृपा होने पर आयु, पुत्र, बल, वैभव, यश ,कीर्ति,,स्वर्ग पशु मार्केंडय पुराण के अनुसार दीर्घ आयु धन, संतान, मोक्ष प्राप्त करता है

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